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Sunday 7 August 2022

 गर्भावस्था के लक्षण [pregnancy Symptoms]

एक स्वस्थ स्त्री को हर महीने मासिक स्राव (माहवारी) होती है। गर्भ ठहरने के बाद उसी महीने से मासिक स्राव होना बन्द हो जाता है। इसके साथ-साथ दिल का खराब होना, उल्टी होना, बार-बार पेशाब का होना तथा स्तनों में हल्का दर्द बना रहना आदि साधारण शिकायतें होती हैं। इन शिकायतों को लेकर स्त्रियां, स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाती हैं। डॉक्टर स्त्री के पेट और योनि की जांच करती है और बच्चेदानी की ऊंचाई को देखती है। गर्भधारण करने के बाद बच्चेदानी का बाहरी भाग मुलायम हो जाता है। इन सभी बातों को देखकर डॉक्टर स्त्री को मां बनने का संकेत देता है। इसी बात को अच्छे ढंग से मालूम करने के लिए डॉक्टर रक्त या मूत्र की जांच के लिए राय देता है।

 स्त्री के रक्त और पेशाब की जांच

गर्भवती स्त्री के रक्त और मूत्र में एच.सी. जी. होता है जो करिऔन से बनता है। ये कौरिऔन ओवल बनाती है। ओवल का एक भाग बच्चेदानी की दीवार से तथा बच्चे की नाभि से जुड़ा होता है। इसके शरीर में पैदा होते ही रक्त और मूत्र में एच.सी. जी. आ जाता है। इस कारण स्त्री को आगे माहवारी होना रुक जाती है।

एच.सी.जी. की जांच रक्त या मूत्र से की जाती है। साधारणतः डॉक्टर मूत्र की जांच ही करा लेते हैं। जांच माहवारी आने की तारीख के दो सप्ताह बाद करानी चाहिए ताकि जांच का सही परिणाम मालूम हो सके।यदि जांच दो सप्ताह से पहले ही करवा ली जाए तो परिणाम हां या नहीं में मिल जाता है। यह वीकली पाजिटिव कहलाता है।

कुछ स्त्रियां माहवारी शुरु करने के लिए दवाईयों का सेवन करना शुरू कर देती हैं। इस प्रकार की दवा का सेवन उनके लिए हानिकारक होता है इसलिए जैसे ही यह मालूम चले कि आपने गर्भधारण कर लिया है तो अपने रहन-सहन और खानपान पर ध्यान देना शुरू कर देना चाहिए।

गर्भधारण करने के बाद स्त्री को किसी भी प्रकार की दवा के सेवन से पूर्व डॉक्टरों की राय लेना अनिवार्य होता है। ताकि वह किसी ऐसी दवा का सेवन न करें जो उसके और उसके होने वाले बच्चे के लिए हानिकारक होता है। यदि स्त्री को शूगर का रोग हो तो इसकी चिकित्सा गर्भधारण से पहले ही करानी चाहिए। यदि मिर्गी, सांस की शिकायत या फिर टी.बी. का रोग हो तो भी इसके लिए भी डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

यह भी सच है कि स्त्री के विचार और कार्य भी गर्भधारण के समय ठीक और अच्छे होने चाहिए ताकि उसके होने वाले बच्चे पर अच्छा प्रभाव पड़े।

गर्भावस्था की पुरी जानकारी

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Wednesday 13 July 2022

 गर्भावस्था की पुरी जानकारी

कोई भी स्त्री और पुरुष जब आपस में सभोग क्रिया करते हैं तो निषेचन के कुछ ही घंटों के अंदर पुरुष के शुक्राणु और स्त्री के अंडाणु आपस में एकसाथ मिल जाते हैं। इसको जायगोर कहा जाता है। लगभग 24 घंटों के बाद यह जायगोर 2 भागों में बंट जाता है और इसके बाद यह दुबारा 4, 8, 16,32,64 कोषो में बंट जाता है। इस प्रकार की प्रक्रिया चलते रहने के अंदर 72 घंटों में इन कोषों का एक बड़ा समूह बन जाता है। गर्भावस्था के

पहले 8 सप्ताहों (लगभग 2 महीने) तक गर्भ में पल रहे बच्चे को भ्रूण कहा जाता है।निषेचित हो चुका स्त्री का अंडाणु अंडवाहिनी की गुहा में धीरे-धीरे एक हफ्ते तक गर्भाशय की ओर बढ़ता

रहता है। इसके साथ-साथ जायगोर भी कोषों में बंटता रहता है। तीसरे हफ्ते में यह गर्भाशय की आंतरिक मुलायम परत के साथ संबंध जोड़ लेता है। यहां पर भ्रूण का विकास होता रहता है। भ्रूण का विकास होने के साथ-साथ ही गर्भाशय का आकार भी बढ़ता जाता है।

गर्भ ठहरने की शुरुआत में भ्रूण को चारों तरफ से एक झिल्ली लपेटकर अपनी थैली में बंद कर लेती है। इस थैली में एक खास प्रकार का तरल पदार्थ भरा होता है इसी तरल पदार्थ के अंदर भ्रूण तैरता रहता है। इस तरल का तापमान हमेशा एक जैसा ही रहता है जिससे भ्रूण अर्थात बच्चे को न तो सर्दी और न ही गर्मी का एहसास होता है।

गर्भधारण करने के 1 महीने के अंदर डिंब बढ़कर चौथाई इंच का हो जाता है। इसके एक तिहाई भाग में सिर और पीठ के उभार और हाथ-पैरों की संरचना दिखाई देती है। इसके बाद रीढ़ की हड्डी का विकास होना शुरू हो जाता है। पीठ के उभार मांस-पेशियों के रूप में बदल जाते हैं। फिर चेहरे, आंख, नाक, कान, मुंह आदि के चिन्हों का बनना शुरू हो जाता है। इसके एक सिरे पर लगभग 2 मिलीमीटर की एक पूंछ होती है जो गर्भ ठहरने के दूसरे महीने के अंत तक रहती है।

गर्भ ठहरने के चौथे हफ्ते में भ्रूण गर्भाशय की अंदरूनी दीवार से संपर्क स्थापित करके पोषित होता रहता है और आक्सीजन ग्रहण करता है। पांचवें सप्ताह में भ्रूण के मस्तिष्क की रचना होना शुरू हो जाती है। इस हफ्ते में कोषों की ऊपरी परत में एक नली का निर्माण होने लगता है जो बच्चे का दिमाग और गर्भनाल बनाती है। इसके साथ-साथ बच्चे का हृदय भी निर्मित होना शुरू हो जाता है। इस अवस्था के दौरान भ्रूण 2 मिलीमीटर बढ़ जाता है।

 गर्भ ठहरने के के छठे - सातवें सप्ताह में भ्रूण के सिर पर एक बड़ा सा उभार निकल आता है और हृदय का विकास होता रहता है। हृदय में धड़कन होना भी शुरू हो जाती है जिसे एक खास किस्म के यंत्र द्वारा ही सुना जा सकता है। भ्रूण के आंख और कान के उभार भी बढ़ जाते हैं। उसके हाथ और पैरों पर भी छोटे-छोटे उभार पैदा हो जाते हैं। लगभग 7 हफ्ते के बाद भ्रूण 8 मिलीमीटर बड़ जाता है।

गर्भ ठहरने के के आठवें और नौवें हफ्ते में भ्रूण में चेहरा और आंखें साफ-साफ नजर आने लगती है। उसके मुंह में जीभ, हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, गुर्दे, हाथ-पैरों की उंगलियां और अंगूठे का विकास होना शुरू हो जाता है। नौवें सप्ताह में भ्रूण 17 मिलीमीटर बड़ा हो जाता है।

लगभग 12 सप्ताह तक बच्चे के सभी अंदरूनी अंग काफी विकसित हो चुके होते हैं लेकिन उनके विकास की प्रकिया लगातार चलती रहती है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि भ्रूण गर्भाशय की पतली झिल्ली में भरे 'एम्निओटिक फ्लयूड' (तरल पदार्थ) में तैरता रहता है। यह तरल पदार्थ भ्रूण को बाहरी समस्याओं से सुरक्षा प्रदान करता है। इस समय तक बच्चे की गतिमय स्थिति का मां को एहसास नहीं हो पाता। स्त्री का गर्भाशय ऊपर की ओर बढ़ता रहता है और पेड़ू में उभार के रूप में दिखाई देने लगता है। लगभग चौदहवें हफ्ते में बच्चे की लंबाई 56 मिलीमीटर तक हो जाती है। बच्चे के बाहरीय लैंगिक अंगों का विकास शुरू हो जाता है लेकिन अब तक ये पहचान नहीं किया जा सकता कि स्त्री के गर्भ में लड़का है या लड़की।

लगभग 15 से 22 हफ्ते में बच्चे की बढ़ोतरी तेज गति - से होती है। उसके सिर पर बाल उगने लगते हैं। आंखों पर पलकें बनने लगती है लेकिन बंद रहती है। अब तक बच्चा काफी गतिशील हो चुका होता है। बच्चे की गति का अनुभव स्त्री को गर्भ ठहरने के अठारह से बीसवें हफ्ते में होता है। इस अनुभव को 'क्विकनिंग' कहा जाता है। बच्चे के मसूढ़ों में दांतों का निर्माण होना शुरू हो जाता है। 22 हफ्ते के बाद बच्चे की लंबाई 160 मिलीमीटर तक हो जाती है।

23 से 30 हफ्ते में बच्चा ज्यादा गतिमान हो जाता है और पेट पर हाथ लगाने से कभी-कभी झटके के साथ कूद सकता है। बच्चा हिचकियां भी लेने लगता है जिसको मां हल्के झटकों के रूप में महसूस करती है। बच्चा 'एम्निओटिक झिल्ली' में भरे तरल पदार्थ को थोड़ी मात्रा में पीता है और मूत्रत्याग करता है। इस समय बच्चे के हृदय की धड़कन को स्त्री के पेट पर कान लगाकर सुना जा सकता है। अगर किसी कारण से अठाईसवें हफ्ते में ही बच्चे का जन्म हो जाता है तो उसके बचने की संभावना बहुत कम होती है। इसके लिए डाक्टरी सहायता की जरूरत पड़ती है। छबीसवें हफ्ते में बच्चे की आंखों की पलकें पहली बार खुलती है।

इकतिसवें से चालीसवें हफ्ते के बीच में बच्चे के शरीर पर बहुत सारा मांस चढ़ जाता है। बतीसवें हफ्ते में बच्चे का सिर स्थिर हो जाता है। छतीसवें हफ्ते में बच्चा 46 सेमीमीटर का हो जाता है। अंडकोषों में अंड आ जाते हैं। चालीसवें हफ्ते में बच्चा पूरी तरह से विकसित हो जाता है और प्रसव द्वारा दुनिया में आने के लिए तैयार हो जाता है। कुछ स्त्रियों में बच्चे का विकास बहुत धीमी गति से होता है जिससे बच्चे का जन्म तयशुदा तारीख से देर में होता है।

बच्चे का विकास कम या ज्यादा होने के अनुसार उसके जन्म की दी हुई तारीख से 5 से 7 दिन का अंतर आ जाता है लेकिन अगर 41 हफ्ते तक बच्चे का जन्म नहीं होता है तो जल्द से जल्द डाक्टर की सहायता लेनी चाहिए।

वैसे तो गर्भ ठहरने से लेकर प्रसव होने तक की अवधि - 280 दिनों की है। यह नौंवा महीना होता है जिसमें बच्चे की लंबाई लगभग 20 इंच और उसका वजन लगभग 3.5 किलोग्राम होता है। बच्चे का सिर नीचे आ जाता है, हाथ-पैर चलने लगते हैं. त्वचा के नीचे काफी मात्रा में चर्बी (फेट) जमा हो जाता है। इस समय बच्चे की शिराएं (नसें) दिखाई नहीं देती है। बच्चे का हर अंग साफ नजर आने लगता है और वह जन्म लेने के लिए तैयार हो जाता है।

गर्भावस्था के लक्षण

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