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Sunday 26 February 2023

दहेज प्रथा पर निबंध | Dowry System Essay in Hindi

 मानवीय समाज में विकास और सामाजिक जीवन की शुरुआत के लिए विवाह को एक पावन और अनिवार्य बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है। वैवाहिक जीवन में नर-नारी एक-दूसरे के पूरक बनकर जीवन को और मधुर बनाते हैं और भारतीय संस्कृति में जो पितृ ऋण होता है उसे वंश वृद्धि के रूप में बढ़ाते हैं।

एक पुरुष के जीवन में स्त्री शीतल जल की तरह होती है जो उसके जीवन को अपने प्यार और सहयोग से सुखी और शांतिपूर्ण बनाती है। लेकिन आज भारत के समाज में जो अनेक कुरीतियाँ फैली हुई हैं वो सब भारत के गौरवशाली समाज पर एक कलंक के समान हैं।



जाति, छूआछूत और दहेज जैसी प्रथाओं की वजह से ही विश्व के उन्नत समाज में रहने पर भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। समय-समय से कई लोग और राजनेता इसे खत्म करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इसका पूरी तरह से नाश नहीं हो पाया है । दहेज प्रथा दिन-ब-दिन और अधिक भयानक होती जा रही है।

जब हम समाचार पत्रों को पढ़ते हैं तो हमें ज्यादातर ऐसी खबरे मिलती हैं जैसे- सास ने बहु पर तेल छिड़ककर आग लगा दी, दहेज न मिलने की वजह से बारात लौटाई, स्टोव फट जाने की वजह से नवविवाहित स्त्री की मृत्यु हो गई। जब हम इन समाचारों को विस्तार से पढ़ते हैं तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कभी-कभी हम यह सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि क्या कोई मनुष्य सच में इतना निर्मम और जालिम हो सकता है ?

दहेज प्रथा

दहेज शब्द अरबी भाषा के जहेज शब्द से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ होता है सौगात। साधारणतया दहेज का अर्थ होता है- विवाह के समय दी जाने वाली वस्तुएँ। जब लडकी का विवाह किया जाता है तो वर पक्ष को जो धन, संपत्ति और सामान दिया जाता है उसे ही दहेज कहते हैं।

हमारे समाज के अनुसार विवाह के बाद लडकी को माता-पिता का घर छोडकर पति के घर जाना होता है। इस समय में कन्या पक्ष के लोग अपना स्नेह दर्शाने के लिए लडकों के संबंधियों को भेंट स्वरूप कुछ-न-कुछ अवश्य देते हैं।

दहेज प्रथा का आरम्भ

ऐसा लगता है जैसे कि यह प्रथा बहुत ही पुरानी है। प्राचीन काल से हमारे भारत में इस कथा का चलन होता आ रहा है। हमारे भारत में कन्यादान को एक धार्मिक कर्म माना जाता है। दहेज प्रथा का वर्णन हमारी लोक कथाओं और प्राचीन काव्यों में भी देखा जा सकता है।

प्राचीनकाल में बेटी को माता-पिता के आशीर्वाद के रूप में अपनी समर्थ शक्ति के अनुसार वस्त्र, गहने, और उसकी गृहस्थी के लिए सामान भेंट में दिया जाता था। इस दहेज का उद्देश्य वर वधु की गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाना था। प्राचीनकाल में लडकी का मान-सम्मान ससुराल में उसके व्यवहार और संस्कारों के आधार पर तय किया जाता था न कि उसके लाए हुए दहेज पर।

सात्विक रूप

दहेज को एक सात्विक प्रथा माना जाता था। जब पुत्री अपने पिता के घर को छोडकर अपने पति के घर जाती है तो उसके पिता का घर पराया हो जाता है। उसका अपने पिता के घर पर से अधिकार खत्म हो जाता है। अत: पिता अपनी संपन्नता का कुछ भाग दहेज के रूप में विदाई के समय अपनी पुत्री को दे देता है।

दहेज में एक और सात्विक भावना भी है। दहेज का एक सात्विक रूप कन्या का अपने घर में श्री समृद्धि की सूचक बनना है। उसके खाली हाथ को पतिगृह में अपशकुन माना जाता है। इसी वजह से वह अपने साथ कपड़े, बर्तन, आभूषण और कुछ ऐसे प्रकार के पदार्थों को साथ लेकर जाती है।

विकृत रूप

दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वस्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौंदर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।

आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली लगाई जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।

इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।

इसी वजह से लडकी की खुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है। आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।

दहेज प्रथा के कारण

एक तरफ जहाँ पर वर पक्ष के लोगों की लोभी वृत्ति ने भी इस कुरीति को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है। दूसरी जगह पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने बहुत कालाधन कमाया जिसकी वजह से वे बढ़-चढकर दहेज देने लगे। उनकी देखा-देख निर्धन माता-पिता भी अपनी बेटी के लिए अच्छे वर ढूंढने लगे और उन्हें भी दहेज का प्रबंध करना पड़ा।

दहेज का प्रबंध करने के लिए निर्धन माता-पिता को बड़े-बड़े कर्ज लेने पड़े, अपनी संपत्ति को बेचना पड़ा और बहुत से कठिन परिश्रम करने पड़े लेकिन फिर भी वर पक्ष की मांगें बढती ही चली गयी दहेज प्रथा का एक सबसे प्रमुख कारण यह भी है कि लडकी को कभी बराबर ही नहीं समझा गया।

वर पक्ष के लोग हमेशा यह समझते हैं कि उन्होंने कन्या पक्ष पर कोई एहसान किया है। यही नहीं वे विवाह के बाद भी लडकी को पूरे मन से अपने परिवार का सदस्य स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इसी वजह से वे बेचारी सीधी-साधी, भावुक, नवविवाहिता को इतने कठोर दंड देते हैं।

दहेज प्रथा के दुष्परिणाम

दहेज प्रथा की वजह से ही बाल विवाह, अनमेल विवाह, विवाह विच्छेद जैसी प्रथाओं ने फिर से समाज में अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया है। दहेज प्रथा की वजह से कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही हैं इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।

जन्म से पहले ही गर्भ में लडकी और लडकों की जाँच की वजह से लडकियों को गर्भ में ही मरवा देते हैं जिसकी वजह से लडकों और लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है। लडकियों के T-पिता दूसरों की तरह दहेज देने की वजह माता- से कर्ज में डूब जाते हैं और अपनी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देते हैं।
लडके वाले अधिक दहेज मांगना शुरू कर देते हैं और दहेज न मिलने पर नवविवाहिता को तंग करते हैं और उसे जलाकर मारने की भी कोशिश करते हैं। कभी-कभी लडकी यह सब सहन नहीं कर पाती है और आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती है या फिर तलाक देने के लिए मजबूर हो जाती है।

दहेज न होने की वजह से योग्य कन्या को अयोग्य वर को सौंप दिया जाता है। जो कन्याएं अयोग्य होती हैं वे अपने धन के बल पर योग्य वरों को खरीद लेती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए गैर कानूनी काम भी करने से पीछे नहीं हट पाते हैं। आज के समय में लडकों और लडकियों की खुले आम नीलामी की जाती है।

आज के माता-पिता अपने सरकारी, अधिकारी और इंजीनियर लडके को लाखों से कम में नीलाम नहीं करते हैं जिसकी वजह से अनेक सामाजिक कुरीतियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। रोज समाचार पत्र और पत्रिकाओं में पढ़ा जाता है कि दहेज न मिलने की वजह से लडकी पर उसके ससुराल वालों ने अमानवीय और क्रूर अत्याचार किये जिसकी वजह से आधुनिक पीढ़ी बहुत अधिक प्रभावित होती है।

उन्हें देखने को मिलता है कि स्टोव फटना, आग लगना, गैस या सिलिंडर से जलना यह सब कुछ सिर्फ नवविवाहिताओं के साथ ही होता है। आज की नारी जागृत, समानता, वैज्ञानिक दृष्टि, प्रगति और चहुमुखी विकास के इस युग में अपनी वास्तविकता की भावना से हटकर दहेज प्रथा एक तरह से दवाब डालकर लाभ कमाने का एक सौदा और साधन बनकर रह गया है। दहेज अपनी आखिरी सीमा को पार करके एक सामाजिक कलंक बन चूका है।

दहेज प्रथा का समाधान

अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो उसके लिए खुद युवकों को आगे बढना चाहिए। उन्हें अपने माता-पिता और सगे संबंधियों को बिना दहेज के शादी करने के लिए स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। जो लोग नवविवाहिता को शारीरक और मानसिक कष्ट देते हैं युवकों को उनका विरोध करना चाहिए।

दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए नारी का आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होना भी बहुत जरूरी होता है। जो युवती अपने पैरों पर खड़ी होती है उस युवती से कोई भी अनाप-शनाप नहीं कह सकता है। इसके अलावा वह पूरे दिन घर में बंद नहीं रहेगी और सास और नंद के तानों से भी बच जाएगी।

'के बहु के नाराज होने की वजह से मासिक आय के हाथ से निकल जाने का डर भी उन्हें कुछ बोलने नहीं देगा। लडकियों को हमेशा लडकों के बराबर समझना होगा और उन्हें भी लडकों जितने ही अधिकार और शिक्षा भी देनी होगी । दहेज की लड़ाई को लड़ने में कानून भी हमारी सहायता कर सकता है।

जब से हमारा देश दहेज निषेध विधेयक बना है तब से वर पक्ष के अत्याचारों में बहुत कमी आ गयी है। दहेज प्रथा की बुराई को तभी खत्म किया जा सकता है जब युवक और युवतियां खुद जाग्रत होंगे। जो लोग दहेज देते और लेते हैं उन पर कड़ी से कड़ी कर्यवाई की जानी चाहिए और उन पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए।

विवाह में अधिक खर्च और अधिक बारातियों को रोकने का विधान था। लेकिन जब कानून को समाज का सहयोग नहीं मिल रहा हो तो कानून भी विवश हो गया है। दहेज प्रथा को सामाजिक चेतना और नैतिक जागृति के माध्यम से खत्म किया जा सकता है। अनेक प्रकार की स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा दहेज प्रथा के विरुद्ध आंदोलन चलाकर इसे कम कर सकते हैं।

युवतियां दहेज प्रथा को खत्म करने में विशेष योगदान दे सकती हैं वे अपने माता-पिता को दहेज न देने के लिए प्रेरित करें और लोभी व्यक्तियों से विवाह न करें। लोग दहेज का सख्ती से विरोध करें इसकी वजह से जो लोग दहेज की मांग करते हैं उनमें एक प्रकार से प्रेरणा उत्पन्न हो जाएगी। अगर बिना दहेज के विवाह के लिए उन्हें सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जाये और उन्हें सम्मान और पुरुष्कृत करने से भी समाज में बहुत परिवर्तन किया जा सकता है।

उपसंहार

यह समस्या किसी एक पिता की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की समस्या है। इसकी वजह से जीवन बगिया नष्ट हो जाती है। दहेज प्रथा हमारे समाज के लिए एक कोढ़ साबित हो रही है। दहेज को खत्म करने के लिए हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। यह हमें यह याद दिलाती है कि हमें अपने आप को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं है।

जिस समाज में दुल्हनों को यातनाएं दी जाती हैं वह सभ्यों का नहीं बल्कि बिलकुल असभ्यों का समाज है। अब ही समय है कि हम सब मिलकर इस कुरीति को उखाडकर अपने आप को मनुष्य कहलाने का अधिकार वापस प्राप्त कर लें। मनुष्य को सभी कठिनाईयों का सामना करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।
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Friday 4 November 2022

 तुलसी कौन थी?

तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। 

वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.

एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा। 

स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प

नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।

फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे

ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब

भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। 



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Monday 25 July 2022

शिक्षक दिवस पर निबंध

 ये कहा जाता है कि किसी भी पेशे की तुलना अध्यापन से नहीं की जा सकती। ये दुनिया का सबसे नेक कार्य है। पूरे भारत में शिक्षक दिवस के रुप में इस दिन को मनाने के द्वारा 5 सितंबर को अध्यापन पेशे को समर्पित किया गया है। शिक्षकों को सम्मान देने और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को याद करने के लिये हर साल इसे मनाया जाता है। देश के विकास और समाज में हमारे शिक्षकों के योगदान के साथ ही अध्यापन पेशे की महानता को उल्लेखित करने के लिये हमारे पूर्व राष्ट्रपति के जन्मदिवस को समर्पित किया गया है।

                डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान शिक्षक थे जिन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन पेशे को दिया है। वो विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षकों के योगदान और भूमिका के लिये प्रसिद्ध थे। इसलिये वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शिक्षकों के बारे में सोचा और हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने का अनुरोध किया। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था और 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन पेशे में प्रवेश करने के द्वारा दर्शनशास्त्र शिक्षक के रुप में अपने करियर की शुरुआत की।

                 उन्होंने देश में बनारस, चेन्नई, कोलकाता, मैसूर जैसे कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों तथा विदेशों में लंदन के ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र पढ़ाया है। अध्यापन पेशे के प्रति अपने समर्पण की वजह से उन्हें अपने बहुमूल्य सेवा की पहचान के लिये 1949 में विश्वविद्यालय छात्रवृत्ति कमीशन के अध्यक्ष के रुप में नियुक्त किया गया। 1962 से शिक्षक दिवस के रुप में 5 सितंबर को मनाने की शुरुआत हुई। अपने महान कार्यों से देश की लंबे समय तक सेवा करने के बाद 17 अप्रैल 1975 को इनका निधन हो गया।

                 शिक्षक विद्यार्थियो के जीवन के वास्तविक कुम्हार होते हैं जो न सिर्फ हमारे जीवन को आकार देते हैं बल्कि हमें इस काबिल बनाते हैं कि हम पूरी दुनिया में अंधकार होने के बाद भी प्रकाश की तरह जलते रहें। इस वजह से हमारा राष्ट्र ढ़ेर सारे प्रकाश के साथ प्रबुद्ध हो सकता है। इसलिये, देश में सभी शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है। अपने शिक्षकों के महान कार्यों के बराबर हम उन्हें कुछ भी नहीं लौटा सकते हालाँकि, हम उन्हें सम्मान और धन्यावाद दे सकते हैं। हमें पूरे दिल से ये प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि हम अपने शिक्षक का सम्मान करेंगे क्योंकि बिना शिक्षक के इस दुनिया में हम सभी अधूरे हैं।

समाचार पत्र पर निबंध

शिक्षा का महत्व पर निबंध

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 कन्या भ्रूण हत्या[ female feticide]

गर्भ से लिंग परीक्षण जाँच के बाद बालिका शिशु को हटाना कन्या भ्रूण हत्या है। केवल पहले लड़का पाने की परिवार में बुजुर्ग सदस्यों की इच्छाओं को पूरा करने के लिये जन्म से पहले बालिका शिशु को गर्भ में ही मार दिया जाता है। ये सभी प्रक्रिया पारिवारिक दबाव खासतौर से पति और ससुराल पक्ष के लोगों के द्वारा की जाती है। गर्भपात कराने के पीछे सामान्य कारण अनियोजित गर्भ है जबकि कन्या भ्रूण हत्या परिवार द्वारा की जाती है। भारतीय समाज में अनचाहे रुप से पैदा हुई लड़कियों को मारने की प्रथा सदियों से है।

                लोगों का मानना है कि लड़के परिवार के वंश को जारी रखते हैं जबकि वो ये बेहद आसान सी बात नहीं समझते कि दुनिया में लड़कियाँ ही शिशु को जन्म दे सकती हैं, लड़के नहीं।

                 कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक नीतियों के कारण पुराने समय से किया जा रहा कन्या भ्रूण हत्या एक अनैतिक कार्य है। भारतीय समाज में कन्या भ्रूण हत्या के निम्न कारण हैं।

      कन्या भ्रूण हत्या की मुख्य वजह बालिका शिशु पर बालक शिशु की प्राथमिकता है क्योंकि पुत्र आय का मुख्य स्त्रोत होता है जबकि लड़कियां केवल उपभोक्ता के रुप में होती हैं। समाज में ये गलतफहमी है कि लड़के अपने अभिवावक की सेवा करते हैं जबकि लड़कियाँ पराया धन होती है।

  • दहेज़ व्यवस्था की पुरानी प्रथा भारत में अभिवावकों के सामने एक बड़ी चुनौती है जो लड़कियां पैदा होने से बचने का मुख्य कारण है।
  • पुरुषवादी भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति निम्न है।
  •     अभिवावक मानते हैं कि पुत्र समाज में उनके नाम को आगे बढ़ायेंगे जबकि लड़कियां केवल घर संभालने के लिये होती हैं।
  •      गैर-कानूनी लिंग परीक्षण और बालिका शिशु की समाप्ति के लिये भारत में दूसरा बड़ा कारण गर्भपात की कानूनी मान्यता है।
  •      तकनीकी उन्नति ने भी कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा दिया है।

                जैसा कि हम सभी जानते हैं कि महिलाओं के भविष्य के लिये कन्या भ्रूण हत्या एक अपराध और सामाजिक आपदा है। भारतीय समाज में होने कन्या भ्रूण हत्याओं के कारणों का हमें ध्यान देना चाहिये और नियमित तौर पर एक-एक करके सभी को सुलझाना चाहिये। लैंगिक भेदभाव की वजह से ही मुख्यत: कन्या भ्रूण हत्या होती है। इसके ऊपर नियंत्रण के लिये कानूनी शिकंजा होना चाहिये। भारत के सभी नागरिकों द्वारा इससे संबंधित नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिये। और इस क्रूरतम अपराध के लिये किसी को भी गलत पाये जाने पर निश्चित तौर पर सजा मिलनी चाहिये। चिकित्सों के इसमें शामिल होने की स्थिति में उनका स्थायी तौर पर लाइसेंस को रद्द करना चाहिये। 

                गैरकानूनी लिंग परीक्षण और गर्भपात के लिये खासतौर से मेडिकल उपकरणों के विपणन को रोकना चाहिये। उन अभिवावकों को दण्डित करना चाहिये जो अपनी लड़की को मारना चाहते हैं। युवा जोड़ों को जागरुक करने के लिये नियमित अभियान और सेमिनार आयोजित करने चाहिये। महिलाओं का सशक्तिकरण होना चाहिये जिससे वो अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत हो सकें।

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Tuesday 12 July 2022

समाचार पत्र पर निबंध | essay on the newspaper

समाचार पत्र पर निबंध 

 समाचार पत्र या अख़बार, समाचारो पर आधारित एक प्रकाशन है। इसमे मुख्य रूप से ताजी घटनाएँ, खेल.कूद, व्यक्तित्व, राजनीति व विज्ञापन की जानकारियाँ सस्ते कागज पर छपी होती है। समाचार पत्र संचार के साधनो में महत्वपुर्ण स्थान रखते हैं । ये कागज़ पर शब्दों से बनें वाक्यों को लिख कर या छाप कर तेयार किये जाते हैं। समाचार पत्र प्रायः दैनिक होते हैं लेकिन कुछ समाचार पत्र साप्ताहिकए पाक्षिकए मासिक एवं छमाही भी होतें हैं। अधिकतर समाचारपत्र स्थानीय भाषाओं मे और स्थानीय विषयों पर केन्द्रित होते है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है क्योंकि उसमें बुद्धि और ज्ञान है। जितना ज्ञान मनुष्य में रहता है वह उससे और अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता है और इसके लिए तरह-तरह के साधनों का आविष्कार करता है। विज्ञान ने संसार को बहुत छोटा बना दिया है। आवागमन के साधनों की वजह से स्थानीय दूरियां खत्म हो गयी हैं।

रेडियों, दूरदर्शन और समाचार पत्रों ने संसार को एक परिवार के बंधन में बांध दिया है। इन साधनों की मदद से हम घर पर बैठकर दूर के देशों की खबर पढ़ लेते हैं और सुन भी लेते हैं। इन साधनों की मदद की वजह से हमें दूसरे देशों में जाना नहीं पड़ता है।

कहाँ पर क्या घटित हुआ है किस देश की गतिविधियाँ क्या है यह बात हमें घर बैठे समाचार पत्रों से ही प्राप्त हो जाती है। मनुष्य के जीवन में जितना महत्व रोटी और पानी का होता है उतना ही समाचार पत्रों का भी होता है। आज के समय में समाचार पत्र जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। समाचार पत्र की शक्ति असीम होती है।

भारत में समाचार पत्र का आरंभ : भारत में अंग्रेजों के आने से पहले समाचार पत्रों का प्रचलन नहीं था। अंग्रेजों ने ही भारत में समाचार पत्रों का विकास किया था। सन् 1780 में कोलकाता में भारत का सबसे पहला समाचार पत्र प्रकाशित किया गया जिसका नाम दी बंगाल गैजेट था और इसका संपादन जेम्स हिक्की ने किया था। यही वो पल था जिसके बाद से समाचार पत्रों का विकास हुआ था।

भारत में सबसे पहले समाचार दर्पण का प्रकाशन आरंभ हुआ था। समाचार दर्पण के बाद उदंत मार्तंड का प्रकाशन भी आरंभ हुआ था। उसके तुरंत बाद, 1850 में राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने बनारस अखबार को प्रकाशित किया था। इसके बाद भारत में बहुत सी पत्रिकाओं का संपादन किया गया था

जिस तरह से मुद्रण कला का विकास होने लगा उसी तरह से समाचार पत्रों की भी संख्या बढने लगी थी। आज देश के प्रत्येक भाग में समाचार पत्रों का प्रकाशन हो रहा है। कुछ ऐसे राष्ट्रिय स्तर के समाचार भी होते हैं जिनका प्रकाशन नियमित रूप से होता है।

समाचार पत्रों के भेद : समाचार पत्र कई प्रकार के होते हैं। समाचार पत्रों को दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, वार्षिक आदि भागों में बांटा जाता है। दैनिक समाचार पत्रों में हर तरह के समाचार को प्रमुखता दी जाती है। अन्य पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों पर विभिन्न लेखकों के लेख, किसी भी घटना की समीक्षा, किसी भी गणमान्य जन का साक्षात्कार प्रकाशित होता है। बहुत सी पत्रिकाएँ साल में एक बार विशेषांक निकालती हैं जिसमें साहित्यिक, राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक, पौराणिक विषयों पर ज्ञानवर्धक, सारगर्भित सामग्रियों का वृहंद संग्रह होता है।


                समाचारपत्रो का इतिहास : सबसे पहला ज्ञात समाचारपत्र 59 ई0 का “द रोमन एक्टा डिउरना” है। जूलिएस सीसर ने जनसाधरण को महत्वपूर्ण राजनैतिज्ञ और समाजिक घटनाओं से अवगत कराने के लिए उन्हे शहरो के प्रमुख स्थानो पर प्रेषित किया। 8वी शताब्दी मे चीन मे हस्तलिखित समाचारपत्रो का प्रचलन हुआ।

               अखबार का इतिहास और योगदान यूँ तो ब्रिटिश शासन के एक पूर्व अधिकारी के द्वारा अखबारों की शुरुआत मानी जाती हैए लेकिन उसका स्वरूप अखबारों की तरह नहीं था। वह केवल एक पन्ने का सूचनात्मक पर्चा था। पूर्णरूपेण अखबार बंगाल से “बंगाल गज़ट” के नाम से वायसराय हिक्की द्वारा निकाला गया था। आरंभ में अँग्रेजों ने अपने फायदे के लिए अखबारों का इस्तेमाल कियाए चूँकि सारे अखबार अँग्रेजी में ही निकल रहे थे, इसलिए बहुसंख्यक लोगों तक खबरें और सूचनाएँ पहुँच नहीं पाती थीं। जो खबरें बाहर निकलकर आती थीं। उन्हें काफी तोड़.मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता थाए ताकि अँग्रेजी सरकार के अत्याचारों की खबरें दबी रह जाएँ। अँग्रेज सिपाही किसी भी क्षेत्र में घुसकर मनमाना व्यवहार करते थे। लूटए हत्याए बलात्कार जैसी घटनाएँ आम होती थीं। वो जिस भी क्षेत्र से गुजरते, वहाँ अपना आतंक फैलाते रहते थे। उनके खिलाफ न तो मुकदमे होते और न ही उन्हें कोई दंड ही दिया जाता था। इन नारकीय परिस्थितियों को झेलते हुए भी लोग खामोश थे। इस दौरान भारत में “हिंदुस्तान टाइम्सष”, “नेशनल हेराल्ड”, “पायनियर”, “मुंबई मिरर” जैसे अखबार अँग्रेजी में निकलते थे। जिसमें उन अत्याचारों का दूर.दूर तक उल्लेख नहीं रहता था। इन अँग्रेजी पत्रों के अतिरिक्त बंगलाए उर्दू आदि में पत्रों का प्रकाशन तो होता रहाए लेकिन उसका दायरा सीमित था। उसे कोई बंगाली पढ़ने वाला या उर्दू जानने वाला ही समझ सकता था। ऐसे में पहली बार 30 मईए 1826 को हिन्दी का प्रथम पत्र ष्उदंत मार्तंडष् का पहला अंक प्रकाशित हुआ।

                यह पत्र साप्ताहिक था। उदंत.मार्तंड की शुरुआत ने भाषायी स्तर पर लोगों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। यह केवल एक पत्र नहीं थाए बल्कि उन हजारों लोगों की जुबान थाए जो अब तक खामोश और भयभीत थे। हिन्दी में पत्रों की शुरुआत से देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और आजादी की जंग को भी एक नई दिशा मिली। अब लोगों तक देश के कोने.कोन में घट रही घटनाओं की जानकारी पहुँचने लगी। लेकिन कुछ ही समय बाद इस पत्र के संपादक जुगल किशोर को सहायता के अभाव में 11 दिसंबरए 1827 को पत्र बंद करना पड़ा। 10 मई 1829 को बंगाल से हिन्दी अखबार श्बंगदूतश् का प्रकाशन हुआ। यह पत्र भी लोगों की आवाज बना और उन्हें जोड़े रखने का माध्यम। इसके बाद जुलाईए 1854 में श्यामसुंदर सेन ने कलकत्ता से समाचार सुधा वर्षण का प्रकाशन किया। उस दौरान जिन भी अखबारों ने अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई भी खबर या आलेख छपाए उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी। अखबारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता था। उसकी प्रतियाँ जलवाई जाती थीं, उसके प्रकाशकों, संपादकों, लेखकों को दंड दिया जाता था। उन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता था, ताकि वो दुबारा फिर उठने की हिम्मत न जुटा पाएँ।

              आजादी की लहर जिस तरह पूरे देश में फैल रही थी, अखबार भी अत्याचारों को सहकर और मुखर हो रहे थे। यही वजह थी कि बंगाल विभाजन के उपरांत हिन्दी पत्रों की आवाज और बुलंद हो गई। लोकमान्य तिलक ने “केसरी” का संपादन किया और लाला लाजपत राय ने पंजाब से “वंदे मातरम” पत्र निकाला। इन पत्रों ने युवाओं को आजादी की लड़ाई में अधिक.से.अधिक सहयोग देने का आह्वान किया। इन पत्रों ने आजादी पाने का एक जज्बा पैदा कर दिया। केसरी को नागपुर से माधवराव सप्रे ने निकाला, लेकिन तिलक के उत्तेजक लेखों के कारण इस पत्र पर पाबंदी लगा दी गई।

                उत्तर भारत में आजादी की जंग में जान फूँकने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से साप्ताहिक पत्र “प्रताप” का प्रकाशन आरंभ किया। इसमें देश के हर हिस्से में हो रहे अत्याचारों के बारे में जानकारियाँ प्रकाशित होती थीं। इससे लोगों में आक्रोश भड़कने लगा था और वे ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए और भी उत्साहित हो उठे थे। इसकी आक्रामकता को देखते हुए अँग्रेज प्रशासन ने इसके लेखकों, संपादकों को तरह.तरह की प्रताड़नाएँ दीं। लेकिन यह पत्र अपने लक्ष्य पर डटा रहा।

               इसी प्रकार बंगालए बिहार, महाराष्ट्र के क्षेत्रों से पत्रों का प्रकाशन होता रहा। उन पत्रों ने लोगों में स्वतंत्रता को पाने की ललक और जागरूकता फैलाने का प्रयास किया। अगर यह कहा जाए कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ये अखबार किसी हथियार से कमतर नहीं थेए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

                अखबार बने आजादी का हथियार प्रेस आज जितना स्वतंत्र और मुखर दिखता है। आजादी की जंग में यह उतनी ही बंदिशों और पाबंदियों से बँधा हुआ था। न तो उसमें मनोरंजन का पुट था और न ही ये किसी की कमाई का जरिया ही। ये अखबार और पत्र.पत्रिकाएँ आजादी के जाँबाजों का एक हथियार और माध्यम थेए जो उन्हें लोगों और घटनाओं से जोड़े रखता था। आजादी की लड़ाई का कोई भी ऐसा योद्धा नहीं थाए जिसने अखबारों के जरिए अपनी बात कहने का प्रयास न किया हो। गाँधीजी ने भी हरिजन और यंग इंडिया के नाम से अखबारों का प्रकाशन किया था तो मौलाना अबुल कलाम आजाद ने “अल हिलाल” पत्र का प्रकाशन। ऐसे और कितने ही उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि पत्र.पत्रिकाओं की आजादी की लड़ाई में महती भूमिका थी।

                 यह वह दौर थाए जब लोगों के पास संवाद का कोई साधन नहीं था। उस पर भी अँग्रेजों के अत्याचारों के शिकार असहाय लोग चुपचाप सारे अत्याचर सहते थे। न तो कोई उनकी सुनने वाला था और न उनके दुरूखों को हरने वाला। वो कहते भी तो किससे और कैसे, हर कोई तो उसी प्रताड़ना को झेल रहे थे। ऐसे में पत्र.पत्रिकाओं की शुरुआत ने लोगों को हिम्मत दी, उन्हें ढाँढस बँधाया। यही कारण था कि क्रांतिकारियों के एक-एक लेख जनता में नई स्फूर्ति और देशभक्ति का संचार करते थे। भारतेंदु का नाटक “भारत दुर्दशा” जब प्रकाशित हुआ था तो लोगों को यह अनुभव हुआ था कि भारत के लोग कैसे दौर से गुजर रहे हैं और अँग्रेजों की मंशा क्या है।

समाचार-पत्रों का उद्भव और विकास : प्राचीन काल में समाचार पाने और भेजने के बहुत से साधन थे जैसे- कबूतर, घोडा, बाज, संदेशवाहक, भ्रमणकारी, पंडित तथा फकीर आदि। देवताओं के संदेशों को एक जगह से दूसरी जगह पर पहुँचाने का काम भी नारद जी करते थे। वे तीनों लोकों में समाचारों को फैलाते थे। वर्तमान समय के नारद हैं समाचार पत्र।

छापाखाना के आविष्कार के बाद समाचार पत्र छपने लगे। मुगलों के जमाने में भारत का पहला समाचार पत्र अखबार इ मुअल्ले निकला था जो हाथ से लिखा जाता था। समाचार-पत्रों का उद्भव 16 वीं शताब्दी में चीन में हुआ था। संसार का सबसे पहला समाचार पत्र पेकिंग गजट है, लेकिन यह समाचार पत्र का नितांत प्रारंभिक और प्राचीन रूप है। लेकिन समाचार पत्र के आधुनिक और परिष्कृत रूप का सबसे पहले प्रयोग मुद्रण के रूप में 17 वीं शताब्दी में इटली के बेसिन प्रांत में हुआ था।

जनप्रतिनिधि : आज के समय में समाचार पत्र जनता के विचारों के प्रसार का सबसे बड़ा साधन सिद्ध हो रहा है। समाचार पत्र धनिकों की वस्तु न होकर जनता की आवाज है। समाचार पत्र शोषितों और दलितों की पुकार होते हैं। आज के समय में समाचार पत्र माता-पिता, स्कूल-कॉलेज, शिक्षक, थियेटर के आदर्श और उत्प्रेरक हैं ।

समाचार पत्र हमारे परामर्शदाता और साथी सब कुछ होते हैं। इसी वजह से समाचार पत्र सच्चे अर्थों में जनता के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाचार पत्र बीते हुए कुछ घंटों पहले का ताजा और अच्छा चित्रण करते हैं। इसी वजह से समाचार पत्रों के लिए कहा जाता है कि सुबह के समाचार से ताजा कुछ नहीं और शाम के समाचार से बासी कुछ नहीं।

जन जागरण का माध्यम : समाचार पत्रों से हमें केवल समाचार ही प्राप्त नहीं होते हैं बल्कि जन-जागरण का भी माध्यम होता है। समाचार पत्र मानव जाति को समीप लाने का भी काम करते हैं। जिन देशों में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी है वहां पर उनका विशेष महत्व होता है। समाचार पत्र लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित कराते हैं।

समाचार पत्र सरकार के उन कामों की कड़ी आलोचना करते हैं जो देश के लिए या जनसाधारण के लिए लाभकारी नहीं है। खुशी की बात यह है कि दो-चार समाचार पत्रों को छोड़कर शेष सभी अपने दायित्व को अच्छी तरह से निभा रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में हमारे देश के समाचार पत्रों ने अच्छी भूमिका निभाई और अन्याय तथा अत्याचार का डटकर विरोध किया।

विविधता : आखिर दो-तीन रुपए के समाचार पत्र में क्या नहीं होता है? कार्टून, देश भर के महत्वपूर्ण और मनोरंजक समाचार, संपादकीय लेख, विद्वानों के लेख, नेताओं के भाषण की रिपोर्ट, व्यापार और मेलों की सूचना, विशेष संस्करणों में स्त्रियों और बच्चों के उपयोग की सामग्री, पुस्तकों की आलोचना, नाटक, कहानी, धारावाहिक, उपन्यास, हास्य व्यंग्यात्मक लेख आदि विशेष सामग्री शामिल होती है।

समाज सुधार : समाचार पत्र सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सहायता करते हैं। समाचार पत्रों से बड़ों-बड़ों के मिजाज ठीक हो जाते हैं। समाचार पत्र सरकारी नीति के प्रकाश और खंडन का सुंदर साधन होता है। इसके द्वारा शासन में भी सुधार किया जा सकता है।

समाचार पत्रों के लाभ : समाचार पत्र समाज के लिए बहुत लाभकारी होते हैं। समाचार पत्र विश्व में आपसी भाईचारे और मानवता की भावना उत्पन्न करते हैं और साथ-ही-साथ सामाजिक रुढियों, कुरीतियों, अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाते हैं। यही नहीं, ये लोगों में देशप्रेम की भावना भी उत्पन्न करते हैं। ये व्यक्ति की स्वाधीनता और उसके अधिकारों की भी रक्षा करते हैं।

चुनाव के दिनों में समाचार-पत्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जाती है। आज के समय में किसी भी प्रकार की शासन पद्धति ही क्यों न हो लेकिन समाचार पत्र ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन के विरुद्ध समाचार पत्रों ने ही तो जनमत तैयार किया था। इसी तरह से समाचार-पत्रों के संपादकों और पत्रकारों ने अन्याय का विरोध करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।

समाचार पत्र विविध क्षेत्रों में घटित घटनाओं के समाचारों को चारों ओर प्रसारित करने के सशक्त माध्यम हैं। प्रत्येक देश के शासकों के विभिन्न कार्यक्रमों को समाचार पत्र यत्र-तत्र सर्वत्र प्रसारित करते हैं। संसार में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे विश्व संगठनों की विभिन्न गतिविधियों को व्दारा दूर दुर तक पहूचाते है। समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाली सरकारी सूचनाओं, आज्ञाओं और विज्ञापनों से हमें आवश्यक और महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाती है। समाचार पत्र एक व्यवसाय बन गया है जिससे हजारों संपादकों, लेखकों, रिपोर्टरों व अन्य कर्मचारियों को जीविका का साधन भी मिलता है। समाचार पत्रों से पाठक का मानसिक विकास होता है।

उनकी जिज्ञासा शांत होती है और साथ-ही-साथ ज्ञान पिप्सा भी बढ़ जाती है। समाचार पत्र एक व्यक्ति से लेकर सारे देश की आवाज होते हैं जो अन्य देशों में पहुंचती है। समाचार पत्रों से भावना एवं चिंतन के क्षेत्र का विकास होता है।

समाचार पत्रों में रिक्त स्थानों की सूचना, सिनेमा जगत के समाचार, क्रीडा जगत की गतिविधियाँ, परीक्षाओं के परिणाम, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, वस्तुओं के भावों के उतार-चढ़ाव, उत्कृष्ट कविताएँ चित्र, कहानियाँ, धारावाहिक, उपन्यास आदि प्रकाशित होते हैं। समाचार पत्रों के विशेषांक बहुत उपयोगी होते हैं। इनमें महान व्यक्तियों की जीवन गाथा, धार्मिक, सामाजिक आदि उत्सवों का बड़े विस्तार से परिचय रहता है।

व्यापार वृद्धि : समाचार पत्र व्यापार के सर्वसुलभ साधन होते हैं। क्रय करने वाले और विक्रय करने वाले दोनों ही अपनी सूचना का माध्यम समाचार पत्रों को बनाते हैं। समाचार पत्रों से जितना अधिक लाभ साधारण जनता को होता है उतना ही लाभ व्यापारियों को भी होता है। बाजारों का उतार-चढ़ाव भी इन समाचार पत्रों की सूचनाओं पर चलता है। सभी व्यापारी बड़ी उत्कंठा से समाचार पत्रों को पढ़ते हैं।

शिक्षा के साधन : समाचार पत्र केवल समाचारों का ही प्रसारण नहीं करते हैं अपितु बहुत से विषयों में ज्ञानवर्धन भी करते हैं। बहुत सहायक होते हैं। नियमित रूप से समाचारों को पढने से बहुत लाभ होते हैं। समाचार पत्रों को पढने से इतिहास, भूगोल, राजनीति, साहित्य, विज्ञान और मानवदर्शन का ज्ञान सहज में ही हो जाता है।

विभिन्न साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्रिकाओं में अनेक साहित्यिक व दार्शनिक लेख निकलते रहते हैं जो विभिन्न अनुभवी एवम् विद्वान लेखकों द्वारा संकलित होते हैं। दैनिक समाचार पत्र के संपादकीय में समसामयिक विषयों पर अत्यंत सारगर्भित विचार व रहस्यपूर्ण जानकारी निकलती रहती है, जिससे उस विषय का गहन ज्ञान प्राप्त होता है।

मनोरंजन के साधन : समाचार-पत्रों से जनता का मनोरंजन भी होता है। दैनिक पत्रों में, विशेषकर शनिवार व रविवार के पत्रों में कई मनोरंजक कहानियाँ, चुटकुले, प्रहसन, पहेलियाँ आते हैं। इसके अलावा साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्रिकाओं में तो मनोरंजन की भरपूर सामग्री उपलब्ध होती है। समाचार पत्रों में कहानी, गजलों और कविताओं का बहुत ही सुंदर संकलन होता है। 

विज्ञापन : विज्ञापन भी आज के युग में बहुत महत्वपूर्ण हो रहे हैं। सभी लोग विज्ञापन वाले पृष्ठ को जरुर पढ़ते हैं क्योंकि इसी के सहारे वे अपनी जीवन यात्रा का प्रबंध करते हैं। समाचार पत्रों में अनेक व्यवसायिक विज्ञापन निकलते रहते हैं जिनमें विभिन्न कंपनियों में निर्मित वस्तुओं का प्रचार किया जाता है।

इनसे पाठकों को हर वस्तुओं के गुण, दोष व उपयोग का ज्ञान होता है। समाचार पत्रों में सरकारी, गैर सरकारी व निजी क्षेत्रों में नौकरियों के लिए भी विज्ञापन आते हैं जिनमें पाठक अपनी योग्यता के अनुसार प्रार्थना पत्र भेजते हैं। बहुत से पत्र तो पूर्णरूपेण रोजगार के लिए ही प्रकाशित होते हैं जैसे रोजगार समाचार आदि ।

इन्हीं विज्ञापनों में नौकरी की मांगें, वैवाहिक विज्ञापन, व्यक्तिगत सूचनाएँ और व्यापारिक विज्ञापन आदि होते हैं। जो चित्रपट जगत् के विज्ञापन होते हैं उनके लिए विशेष पृष्ठ होते हैं। समाचार पत्र विज्ञान का एक सशक्त माध्यम होता है। उपभोग की वस्तुओं के विज्ञापनों को इन्हीं में छापा जाता है।

समाचार-पत्रों से हानियाँ : समाचार पत्र से जितने लाभ होते हैं उतनी हानियाँ भी होती हैं। समाचार पत्र सीमित विचारधाराओं में बंधे होते हैं। प्राय: पूंजीपति ही समाचार पत्रों के मालिक होते हैं और ये अपना ही प्रचार करते हैं। कुछ समाचार पत्र तो सरकारी नीति की भी पक्षपात प्रशंसा करते हैं।

कुछ ऐसे भी समाचार पत्र होते हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य केवल सरकार का विरोध करना होता है। ये दोनों ही बातें उचित नहीं होती हैं। समाचार पत्रों से पूरा समाज प्रभावित होता है। समाचार पत्र कभी-कभी झूठे और बेकार के समाचारों को छापना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी तो समाचार पत्र सच्चाई को तोड़-तोडकर छाप देते हैं। इसी तरह से सांप्रदायिकता का जहर फैलाने में भी कुछ समाचार पत्र भाग लेते हैं।

जो लोग समाज को लूटते हैं और प्रभावशाली लोगों के दवाब में आकर वे उनके खिलाफ कुछ नहीं लिखते हैं। इसकी वजह से समाज में भ्रष्टाचार और अन्याय को बहुत बल मिलता है। कुछ समाचार पत्र पूंजीपतियों की संपत्ति होते हैं। उन समाचार पत्रों से न्याय, मंगल और सच्चाई की आशा ही नहीं की जा सकती है।

उपसंहार : जो वस्तु जितनी अधिक महत्वपूर्ण होती है उसका दायित्व भी उतना ही अधिक होता है। समाचार-पत्र स्वतंत्र, निर्भीक, निष्पक्ष, सत्य के पुजारी होते हैं लेकिन उनका लगातार जागरूक होना जरूरी है। समाज में फैले हुए अत्याचार, अनाचार, अन्याय और अधर्म का विरोध करना ही समाचार पत्रों का दायित्व होता है।

इसी तरह से रुढियों, कुप्रथाओं और कुरीतियों का उन्मूलन करने में भी समाचार पत्र बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आधुनिक युग में समाचार पत्रों का बहुत अधिक महत्व है। समाचार पत्रों का उतरदायित्व भी होता है कि उसके समाचार निष्पक्ष हों, किसी विशेष पार्टी या पूंजीपति के स्वार्थ का साधन न बनकर रह जाये।

आज की लोकप्रियता व्यवस्था में समाचार पत्रों का अत्यधिक महत्व होता है। समाचार पत्र ज्ञानवर्धन के साधन होते हैं इसलिए उनका नियमित रूप से अध्धयन करना चाहिए। समाचार पत्रों के बिना आज का युग अधुरा होता है। समाचार पत्रों की ताकत बहुत बड़ी होती है। आधुनिक युग में शासकों को जिसका भय होगा वे समाचार पत्र हैं।


शिक्षा के महत्व पर निबंध

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Sunday 10 July 2022

शिक्षा का महत्व पर निबंध | shiksha ke mahatva par nibandh

   शिक्षा का महत्व पर निबंध 

 घर शिक्षा प्राप्त करने पहला स्थान है और सभी के जीवन में अभिभावक पहले शिक्षक होते हैं। हम अपने बचपन में, शिक्षा का पहला पाठ अपने घर विशेषरुप से माँ से से प्राप्त करते हैं। हमारे माता-पिता जीवन में शिक्षा के महत्व को बताते हैं। जब हम 3 या 4 साल के हो जाते हैं, तो हम स्कूल में उपयुक्त, नियमित और क्रमबद्ध पढ़ाई के लिए भेजे जाते हैं, जहाँ हमें बहुत सी परीक्षाएं देनी पड़ती है, तब हमें एक कक्षा उत्तीर्ण करने का प्रमाण मिलता है।



                 एक-एक कक्षा को उत्तीर्ण करते हुए हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, जब तक कि, हम 12वीं कक्षा को पास नहीं कर लेते। इसके बाद, तकनीकी या पेशेवर डिग्री की प्राप्ति के लिए तैयारी शुरु कर देते हैं, जिसे उच्च शिक्षा भी कहा जाता है। उच्च शिक्षा सभी के लिए अच्छी और तकनीकी नौकरी प्राप्त करने के लिए बहुत आवश्यक है।

                  हम अपने अभिभावकों और शिक्षक के प्रयासों के द्वारा अपने जीवन में अच्छे शिक्षित व्यक्ति बनते हैं। वे वास्तव में हमारे शुभचितंक हैं, जिन्होंने हमारे जीवन को सफलता की ओर ले जाने में मदद की। आजकल, शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए बहुत सी सरकारी योजनाएं चलायी जा रही हैं ताकि, सभी की उपयुक्त शिक्षा तक पहुँच संभव हो। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को शिक्षा के महत्व और लाभों को दिखाने के लिए टीवी और अखबारों में बहुत से विज्ञापनों को दिखाया जाता है क्योंकि पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गरीबी और शिक्षा की ओर अधूरी जानकारी के कारण पढ़ाई करना नहीं चाहते हैं।

                पहले, शिक्षा प्रणाली बहुत ही महंगी और कठिन थी, गरीब लोग 12वीं कक्षा के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम नहीं थे। समाज में लोगों के बीच बहुत अन्तर और असमानता थी। उच्च जाति के लोग, अच्छे से शिक्षा प्राप्त करते थे और निम्न जाति के लोगों को स्कूल या कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी। यद्यपि, अब शिक्षा की पूरी प्रक्रिया और विषय में बड़े स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं। भारतीय सरकार के द्वारा सभी के लिए शिक्षा प्रणाली को सुगम और कम महंगी करने के लिए बहुत से नियम और कानून बनाकर लागू किया है।

                 सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, दूरस्थ शिक्षा प्रणाली ने उच्च शिक्षा को सस्ता और सुगम बनाया है, ताकि पिछड़े क्षेत्रों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भविष्य में समान शिक्षा और सफलता प्राप्त करने के अवसर मिलें। भलीभाँति शिक्षित व्यक्ति देश के मजबूत आधार स्तम्भ होते हैं और भविष्य में इसको आगे ले जाने में नेतृत्व करते हैं। इस तरह, शिक्षा वो उपकरण है, जो जीवन, समाज और राष्ट्र में सभी असंभव स्थितियों को संभव बनाती है।

उज्ज्वल भविष्य के लिए शिक्षा का महत्व

उज्ज्वल भविष्य के लिए शिक्षा का महत्व कितना अधिक है उसे हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते क्योंकि शिक्षा ही एक मात्र साधन है जो सभी के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक उपकरण है। जीवन में शिक्षा के इस उपकरण का प्रयोग करके देश और समाज का नाम गर्व से ऊँचा कर सकते है। शिक्षा का उच्च स्तर लोगों को सामाजिक और पारिवारिक आदर और एक अलग पहचान बनाने में मदद करता है। शिक्षा का समय सभी के लिए सामाजिक और व्यक्तिगत रुप से बहुत महत्वपूर्ण समय होता है। शिक्षा किसी भी बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और यहाँ तक कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी हल करने की क्षमता प्रदान करती है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली

भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली को परतंत्र काल की शिक्षा प्रणाली माना जाता है। यह ब्रिटिश शासन की देन मानी जाती है। इस प्रणाली को लॉर्ड मैकाले ने जन्म दिया था। इस प्रणाली की वजह से आज भी सफेद कॉलरों वाले लिपिक और बाबू ही पैदा हो रहे हैं। इसी शिक्षा प्रणाली की वजह से विद्यार्थियों का शारीरिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता है।

प्राचीन भारत में शिक्षा का महत्व : प्राचीन काल में शिक्षा का बहुत महत्व था। सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा का उदय सबसे पहले भारत में हुआ था। प्राचीनकाल में शिक्षा का स्थान नगरों और शोरगुल से बहुत दूर वनों के गुरुकुल में होता था।इन गुरुकुलों का संचालन ऋषि-मुनि करते थे।प्राचीन काल में विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और अपने गुरु के चरणों में बैठकर ही पूरी शिक्षा प्राप्त करते थे।


कुछ इसी तरह के विद्यालय तक्ष शिला और नालंदा थे। यहाँ पर विदेशी भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। फिर मध्ययुग आया तब भारत को लंबे समय तक परतंत्रता भोगनी पड़ी थी।

मुसलमानों के युग में अरबी-फारसी शिक्षा का प्रसार हआ। जब 18 वीं और 19 वीं शताब्दी ई तो शिक्षा को केवल अमीर और सामंत ही ग्रहण कर सकते थे। स्त्री शिक्षा तो लगभग खत्म ही हो गई थी।

नवीन शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता : हमारा भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ था। हमारे कर्णधारों का ध्यान नई शिक्षा प्रणाली की तरफ गया क्योंकि ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली हमारी शिक्षा प्रणाली के अनुकूल नहीं थी। गाँधी जी ने शिक्षा के विषय में कहा था कि शिक्षा का अर्थ बच्चों में सारी शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियों का विकास करना होता है। शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए अनेक समितियां बनाई गयीं।

कमेटी द्वारा एक विशाल योजना बनाई गई जो तीन साल के भीतर 50% शिक्षा का प्रसार कर सके। सैकेंडरी शिक्षा का निर्माण किया गया। विश्वविद्यालय से ही समस्या को सुलझाने के प्रयास किये गये। बाद में बेसिक शिक्षा समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारत में बेसिक शिक्षा का प्रसार करना था। अखिल भारतीय शिक्षा समिति की सिफारिस की वजह से बच्चों में बेसिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया था।

कोठारी आयोग की स्थापना : शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए कोठारी आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर नई योजना लागु करने की सिफारिश की। इस योजना की चर्चा-परिचर्चा लंबे समय तक चली थी। देश के बहुत से राज्यों में इस प्रणाली को लागू किया गया था। इस प्रणाली से दस साल तक दसवीं कक्षा में सामान्य शिक्षा होगी।

इसमें सभी विद्यार्थी एक जैसे विषयों का अध्ययन करेंगे। इस पाठ्यक्रम में दो भाषाएँ, गणित, विज्ञान और सामाजिक पांच विषयों पर अध्ययन किया जायेगा। लेकिन विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा से भी परिचित होना चाहिए। सातवीं की परीक्षा के बाद विद्यार्थी अलग-अलग विषयों पर अध्ययन करेंगे। अगर वो चाहे तो विज्ञान ले सकता है, कॉमर्स ले सकते हैं, और औद्योगिक कार्यों के लिए क्राफ्ट भी ले सकता है।

नवीन शिक्षा नीति के लाभ : नवीन शिक्षा प्रणाली को रोजगार को सामने रखकर बनाया गया है। हम लोग अक्सर देखते हैं कि लोग विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में भाग तो लेते हैं लेकिन पढने में उनकी रूचि नहीं होती है। ऐसे लोग समाज में अनुशासनहीनता और अराजकता पैदा करते हैं। नई शिक्षा नीति से हमें यह लाभ होगा कि ऐसे विद्यार्थी दसवीं तक ही रह जायेगे और वे महाविद्यालय में प्रवेश नहीं ले पाएंगे।

जो विद्यार्थी योग्य होंगे वे कॉलेजों में प्रवेश ले सकेंगें। दसवीं करने के बाद विद्यार्थी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर रोजगार प्राप्त कर सकेंगे। लेकिन अगर हमें नवीन शिक्षा प्रणाली को सफल बनाना है तो स्थान-स्थान पर डिप्लोमा पाठ्यक्रम खोलने पड़ेंगे जिससे दसवीं करने के बाद विद्यार्थी कॉलेजों की तरफ नहीं भागें ।

उपसंहार : इससे शिक्षित लोगों की बेरोजगारी में कमी आएगी और शिक्षित लोगों का समाज में मान-सम्मान होगा। इस शिक्षा प्रणाली से विद्यार्थियों का सर्वंगीण विकास होगा और यह भविष्य के निर्माण के लिए भी सहायक होगी। इस प्रणाली को पूरी तरह से सफल बनाने का भार हमारे शिक्षकों पर है।

दहेज प्रथा पर निबंध

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